Friday, April 14, 2017

साजिश


शर्माजी सत प्रतिशत आश्वस्त थे कि चुनाव में पार्टी का टिकट उन्हें ही मिलेगा। शर्माजी क्या, सभी की जुबान पर यही बात थी। पार्टी के पुराने सदस्य और साथ में रुपयों की कोई कमी नही। पिछले चुनाव में भी पानी की तरह पैसा बहाया था और जीत भी जबरदस्त मिली थी। शर्माजी के शागिर्द और चमचों ने धूमधाम से नामांकन पत्र भरने की तैयारी कर रखी थी।

पार्टी ने कुछ सीटों को छोड़ सभी प्रतियाशिओं की सूची जारी कर दी। कल नामांकन का अंतिम दिन है और शर्माजी के चुनाव क्षेत्र का प्रतियाशी घोषित नही हुआ। शर्माजी पूरे आश्वस्त थे कि टिकट तो उनका पक्का है। घोषणा तो सिर्फ औपचारिकता है।

रात के साढ़े दस बजे शर्माजी के खास शागिर्द चुन्नी लाल का फोन आया।
"शर्माजी ग़ज़ब हो गया।"
"क्या हुआ मुंह से कुछ फूटेगा भी?" शर्माजी ने रौबीली आवाज में कहा।
"मालिक आपका पत्ता साफ़ कर दिया। पार्टी ने टिकट वर्मा को दिया है।" चुन्नी लाल ने कांपती आवाज में कहा।
"क्या बक रहा है? पूरी बोतल सटक गया क्या?"
"मालिक पक्की खबर है। लिस्ट बन गई है और अभी-अभी सुशांत ने बताया है। वह लिस्ट देखकर आया है। सुनने में आया है कि सीट बिकी है। आप आश्वस्त थे और वर्मा ने मोटी रकम में टिकट खरीद ली।"
"चुन्नी तुम फ़ौरन आओ। अपनी पूरी टीम को तुरन्त मेरे घर पहुचने की सूचना दो।"

एक घंटे के अंदर शर्माजी की पूरी टीम उपस्थित हो गई। शर्माजी स्तब्ध हो गए कि यह कैसे हुआ। किसने साजिश रच कर उसका पत्ता काटा है। हाई कमान फोन लगाया लेकिन उसके फोन को किसी ने नही उठाया। पूरी रात जागते बीती। सुबह साढ़े चार बजे पार्टी सचिव के घर पहुंचे। पहले तो सचिव का संदेश मिला की सो रहे हैं। शर्माजी ने उनके घर डेरा जमा दिया तब सचिव को शर्माजी से मिलने आना पड़ा। सचिव ने उत्तर दिया कि सर्व सम्मति से फैसला हुआ है जो पार्टी के हित में है। शर्माजी ने दो टूक कह दिया कि सीधे यहां से पर्चा भरने जा रहे हैं। चुनाव तो लड़ना है चाहे निर्दलीय उम्मीदवार की हैसियत से। देखते हैं कि वर्मा कैसे जीतता है। वोट उसके नाम से मिलते हैं। वर्षों पार्टी की खिदमत में निकाले हैं। पिछले चुनाव में मंत्री को हराया था लेकिन मंत्रीपद भी नही दिया फिर भी कुछ नही कहा लेकिन अब चुप नही रहूंगा। अभी भी फैसला बदल लो वर्ना परिणाम के जिम्मेवार स्वयं होंगे। सचिव को गुस्सा गया और तू तू मैं मैं के बाद शर्माजी निर्वाचन भवन की और रवाना हुए और निर्दलीय उम्मीदवार की हैसियत से पर्चा भर दिया।

पर्चा भरने के पश्चात पार्टी ने नाम वापस लेने के लिए दवाब दिया लेकिन शर्माजी अडिग रहे और नाम वापिस नही लिया।

मतदान में अभी बीस दिन थे। चुनाव प्रचार अभी धीमे चल रहा था। शर्माजी रणनीति बना रहे थे कि जब पार्टी की पूरी मशीन वर्मा का प्रचार करेगी तब अपने बलबूते पर चुनाव कैसे जीता जा सकता है। अपने समर्थकों को एकत्रित किया और संभावना तलाशी। खर्च करने के लिए रकम की कोई कमी नही थी। इस दिशा में एक सप्ताह में शर्माजी को पहली सफलता मिली जब दबी जबान में पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं ने असंतोष दिखाया। काम उन्होंने शर्माजी के साथ पिछले दस वर्ष किया और टिकट वर्मा को मिल गया। शर्माजी ने सबको एकत्रित किया और अंतिम पांच दिनों में चुनाव प्रचार में पूरी शक्ति झोंकने के लिए तैयार किया।

इधर पार्टी निष्क्रिय शर्माजी को देख अपनी जीत पर आश्वत हो गई। शर्माजी गुपचुप अपने प्रचार में जुट गए। निजी रूप में मतदाताओं से मिलने लगे। अंतिम पांच दिन शर्माजी और उनके समर्थकों ने हर संभव कोशिश कर पार्टी के पक्के वोटरों को विश्वास दिलाया कि काम के लिए शर्माजी उपयुक्त हैं। अंतिम दो दिन शर्माजी ने अपनी पूरी सेना के साथ हर गली और मोहल्ले में अपनी हजारी दर्ज करा दी।

एक दिन पहले चुनाव प्रचार समाप्त हो गया। शर्माजी ने अपनी टीम के साथ मतों का अनुमान लगाया कि कितने प्रतिशत मत मिल सकते हैं।
चुन्नी लाल ने कहा "जीत के लिए मैं आश्वस्त नही हूं। मत हमारे और वर्मा के बीच बटेंगे। विरोधी दल के मतों पर हम सेंध नही लगा सके हैं।"
राधेश्याम ने अपनी राय दी "मतदाता पार्टी को देख कर मत दे सकते हैं। हमें मत मिलेंगे पर जीत हो सके इस विषय पर कहना मुश्किल है। तीन तरफ़ा मुकाबला है।"
शर्माजी ने कुछ सोच कर कहा "मुझे अपने हारने पर कोई गम नही है लेकिन मैं वर्मा की जीत बर्दास्त नही कर सकता। उसका हारना जरुरी है। पार्टी की समझ में यह बात तभी आएगी जब वर्मा हारेगा। मेरी कीमत और अहमियत तब पार्टी को समझ आएगी।"

शर्माजी के चेले शर्माजी का मुंह ताकने लगे और सोच में थे कि शर्माजी किस दिशा में सोच रहे हैं।

बीस मिनट तक शांति रही। किसी ने कुछ नही कहा। सिर्फ एक दूसरे के मुंह ताक रहे थे। शांति शर्माजी ने तोड़ी।
"सुनो अपना वोट विरोधी दल को दो। अपने वफादार और पक्के मतदाताओं को निर्देश दे दो कि हर कीमत पर वर्मा की हार सुनिश्चित करें। मेरी हार की परवाह नही करें। विरोधी दल के उम्मीदवार को जीता दें।"
चुन्नी लाल और राधेश्याम ने शर्माजी का संदेश मतदाताओं में पहुंचवा दिया।

मतदान के दिन शर्माजी की पूरी टीम को मतदान केंद्रों से नदारत पाकर पार्टी ने अपनी जीत सुनिश्चित समझ ली।

चार दिन बाद मत गणना के बाद शर्माजी के चेहरे पर कुटिल मुस्कान थी। वर्मा चुनाव हार गया। विरोधी दल को 123567 मत मिले। वर्मा को 109875 मत मिले और शर्माजी को 18765 मत।

शर्माजी ने पार्टी सचिव को फोन पर सिर्फ इतना कहा "निर्णय आपका, मत हमारा और जीत विरोधी की। मुबारक हो।"


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