Wednesday, May 17, 2017

मूड


शाम के समय अभिषेक घर पहुंचा तब घर के बाहर संदीप फोन पर बात कर रहा था। घर के अंदर मोबाइल फोन के सिग्नल पूरे नही मिलते जिस कारण अक्सर फोन करने घर से बाहर आना पड़ता है। संदीप ने अभिधेक को रोक लिया।
"भाई अभिषेक मैच देखना है?"
"कौन सा मैच?"
"अरे आईपीएल क्रिकेट मैच के टिकट मिल गए है। दो टिकट है। कल के मैच के हैं, बोल चलना है। यार स्टेडियम में भीड़ के साथ मैच देखने का आनंद ही अलग होता है।"
"तुम दिव्या को ले जाओ।"
"अभिषेक भाई तुम्हे तो मालूम है दिव्या को मैच में कोई रूचि नहीं है। घर में टीवी पर भी नही देखने देती। झट से सीरियल वाले चैनल लगा देती है। स्टेडियम साथ जाने से मना कर दिया है। चल साथ चलते है, मजा आएगा।"
"यार स्टेडियम में मजा तो आता है। शोर के बीच लोगों के उत्साह को देख जिस्म में एक नयी स्फूर्ति जाती है पर रक्षिता से पूछना पड़ेगा।"
"ठीक है खाने के बाद मैं मिलता हूं।"

बात करने के पश्चात अभिषेक और संदीप ने घर में प्रवेश किया। खाने के पश्चात संदीप और दिव्या अभिषेक के घर आये। दोनों के घर साथ-साथ थे और दोनों परिवारों में घनिष्ठा बहुत थी। दिव्या आइसक्रीम ले आई और सभी आइसक्रीम के लुत्फ़ में बतिया रहे थे। संदीप ने मैच देखने की बात छेड़ी। रक्षिता और दिव्या ने हंसते हुए कहा कि छोटे बच्चों के साथ स्टेडियम में मैच देखना मुश्किल है। पानी की बोतल तक भी स्टेडियम के अंदर नही ले जा सकते। सिक्के भी बाहर रखवा लेते हैं। दोनों ने संदीप और अभिषेक को मैच देखने की अनुमति दे दी।

अगले दिन संदीप और अभिषेक बहुत प्रसन्न थे कि उनकी मुराद पूरी हुई। आईपीएल क्रिकेट मैच देखने स्टेडियम समय से पहले पहुंच गए और फोटो फेसबुक पर अपलोड की। कुछ खिलाड़ियों के साथ फोटो खिंचवाए और ऑटोग्राफ भी लिए। फेसबुक पर अपलोड किए। धीरे-धीरे स्टेडियम दर्शकों से खचाखच भर गया और मैच शुरू हो गया।

संदीप और अभिषेक मैच का लुत्फ़ उठा रहे थे। दोनों के छोटे बच्चे थे। बच्चे उधम मचा रहे थे। दिव्या और रक्षिता बच्चों की धमा चौकड़ी से परेशान हो गई। दोनों ने अपने पतियों को फोन पर डांटना शुरू कर दिया।
"घर कब आओगे?"
"मैच समाप्ति पर।"
"मैच कब समाप्त होगा?"
"अभी तो मैच शुरू हुआ है। तीन घंटे बाद। फिर स्टेडियम से घर आने का एक घंटा।"
"यानि के चार घंटे?"
"इतना तो समय लगेगा।"
"यहां बच्चे नाक में दम कर रहे हैं और तुम मैच देख रहे हो।"
"तुम से पूछ कर गए थे।"
"पूछ कर नही गए थे, सिर्फ बता कर गए थे।"
"तुमने खुद जाने को कहा था, हमने नही कहा था। टिकट खरीदने से पहले हमसे पूछा था क्या?"
"अरे तुमने बोला था तब मैच देखने आये हैं।"
"बोला क्या था, जब टिकट खरीद ली तो क्या मना कर देती। कहते पैसे ख़राब कर दिए, नाम तो मेरा लगता।"
इतना सुन संदीप और अभिषेक एक दूसरे का मुंह ताकने लगे।
"चल भाई संदीप, देख लिया मैच। अब घर में स्पिन और फ़ास्ट दोनों बोलिंग का मजा मिलेगा, रक्षिता दुर्गा का रूप लिए हुए है।"
"सही कहा अभिषेक भाई दिव्या भी चंडी के अवतार में लग रही है।"

दोनों ने पत्नियों को फोन किया कि मैच छोड़ कर घर रहे हैं। इतना सुनकर दोनों ने गुस्से में कहा "आने की जरुरत नही है, फिर कहोगे कि मैंने मैच नही देखने दिया।"

दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा। दोनों असहाय कि क्या करें। पत्नी से पूछ कर मैच देखने आये थे, पूछ कर तो छोड़ो, ख़ुशी-ख़ुशी मैच देखने की अनुमति दी  और अब बरस रही हैं। क्या हुआ उनके मूड को। पत्नियों का मूड भी पल पल में हवा के झोंके के साथ बदल जाता है। दोनों मैच छोड़ घर पहुंचे, वे दोनों किसी भी सूरत में पत्नियों की नाराजगी नही चाहते थे।

घर पहुंचे तब तक बच्चे सो चुके थे। पत्नियों का मूड बिगड़ा हुआ था। चुपचाप दोनों सो गए। तीन दिन बाद रक्षिता और दिव्या के मूड सामान्य हुआ।
तीन दिन बाद रात को ऑफिस से वापस आने पर अभिषेक ने संदीप को घर के बाहर फोन पर बात करते देखा और रुक गया।
"क्या कोई खास बात अभिषेक भाई?" संदीप ने फोन को होल्ड करके पूछा।
अभिषेक ने धीरे से कहा। "आगे से बिना पत्नी घर से नही निकलना। कोई कार्यक्रम नही बनाना।"
संदीप हंसने लगा और मन्द मुस्कराहट के साथ अभिषेक ने घर में प्रवेश किया।


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