Saturday, May 20, 2017

बोझ


सुबह काम पर जाने का बोझ है
सारा दिन काम करने का बोझ है
शाम को तेरी इंतजार का बोझ है
रात को ग़मों का बोझ है

नींद उड़ जाती है बोझ के मारे
घुट कर जी रहा हूं बोझ के मारे
गठरी बन गई ज़िन्दगी बोझ के मारे
बस फरयाद करता हूं बोझ के मारे

खुदा कुछ तो रहम कर अब
गठरी का बोझ कम कर अब
सोचता हूं खूंटी पर टांग दूं अब
अपने पास ही बुला ले अब


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