Friday, July 07, 2017

रोटी, कपड़ा, मकान


रोटी कमाई
कपड़ा पहना
मकान बनाया
सुख नही पाया
हर पल
यही सोचता हूं
कुछ और कपड़ा
मंहगा और आलीशान
किसको दिखाना है
दुनिया को
उसका काम है
गलतियां ढूंढना
फिर क्यों हम
बनातें हैं अनेक मकान
काफी है रहने को
एक छोटा मकान
खानी है एक वक्त
सिर्फ दो रोटी
पिस्ते हैं चक्की में
रोटी, कपड़ा मकान की
तीनों पा गए
चक्की पीस कर
सेहत गवां कर
मिले खूब मिले
भोग सके उनको
अस्पताल बन गया
अपना मकान
पीते है तरल
पहनते हैं
मरीजों वाले कपड़े
सोते हैं जिस खटिया पर

वह अस्पताल की है
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बुढापा

कुछ उम्र में बढ़ गया कुछ जिस्म ढल गया कुछ पुराना हो गया कुछ बुढापा आ गया कुछ अनुभव आ गया कुछ कद्र भी पा गया...