Wednesday, September 13, 2017

अपने पराये


नाम रामलाल, उम्र साठ वर्ष, पुराने बाजार में किराने की छोटी सी दुकान चलाते हैं। अपने गुजारे के लिए कमा भी लेते हैं और थोड़ा सा भविष्य के लिए बच भी जाता है। दुकान पर सब लाला कहते थे और नाम लाला पड़ गया। उनकी धर्मपत्नी भी उन्हें लाला कह कर पुकारती थी। पत्नी का नाम रामवती। जब पत्नी लाला कहती है तब लाला ने पत्नी को लाली कह कर पुकारना शुरू कर दिया। वर्षो से अब वे जग के लिए लाला और लाली बन गए। दोनों का शांत स्वभाव। खाली समय भक्ति में व्यतीत करते। बस एक अफसोस था कि उनकी अपनी कोई औलाद नही थी।

लाली का प्रेम देवर के बेटे चिंटू पर उमड़ता था। एक साथ रहते थे, अपनी औलाद होने पर सारा प्रेम और वात्सल्य चिंटू पर बरसता था। लाला और लाली दोनों के भाई-बहनों के तीन-तीन चार-चार बच्चे थे बस लाला औऱ लाली  निसंतान रह गए। लाला ने अपना उत्तराधिकारी चिंटू को घोषित कर दिया। मां और ताई दोनों के प्यार से चिंटू बिगड़ैल बच्चा बन गया। पढ़ाई में ध्यान लगता नही था। जैसे-तैसे बारह जमात पढ़ गया। तैंतीस प्रतिशत अंक लेकर चिंटू फूला नही समा रहा था। लाला ने उसे दुकान पर बिठा दिया। फ़िल्म देखना, यारों के साथ घूमना, यही दिनचर्या चिंटू की हो गई। दुकान पर एक आध घंटे मुश्किल से ही बैठता था।
एक दिन लाली ने लाला को टोक ही दिया - "लाला चिंटू सारा दिन तो यारों के साथ घूमता रहता है। दुकानदारी कब सीखेगा?"
"सीख लेगा लाली, कच्ची उम्र है। धीरे-धीरे दुकान में भी रम जाएगा। शुरू में ऐसे ही होता है।"
"लाला ठीक है परंतु अब तो एक साल बीत गया है चिंटू को दुकान जाते हुए मुश्किल से एक आध घंटे ही टिकता है दुकान पर। मुझे उसके लक्षण सही नजर नही रहे।"
"लाली सब ठीक हो जाएगा। खेलने की उम्र है। उन्नीस का तो मुश्किल से हुआ है, खेलने दे। धीरे-धीरे दुकानदारी के सारे गुण सिखा दूंगा।"
यह लाला का प्यार था जिसने चिंटू को खुली छूट दे रखी थी। प्यार और छूट का चिंटू ने खूब लाभ उठाया।

दुकान बंद करने के बाद लाला घर के लिए निकले। दुकान से घर की दूरी कुछ खास नही थी। लाला पैदल ही घर जाते थे। रास्ते में लाला को बैचैनी महसूस हुई औऱ पैदल चलने में दिक्कत होने लगी। लाला सड़क के किनारे बिजली के खंभे को पकड़ कर खड़े हो गए। रिक्शे वाले ने लाला को बेचैन देख रिक्शे पर बैठने को कहा।
"लाला रिक्शे पर बैठ जाओ, घर छोड़ देता हूं।" रिक्शे वाला लाला की दुकान का सामान ग्राहकों के घर छोड़ने का काम भी करता था। लाला रिक्शे पर बैठ गए।
"लाला उठो घर गया।" घर के नीचे रिक्शा खड़ा करके रिक्शेवाले ने लाला से कहा।
"भाई सीढियां चढ़ने की हिम्मत नही हो रही। थोड़ा सहारा देकर ऊपर घर तक छोड़ दे।"
रिक्शेवाला लाला को सहारा दे कर सीढियां चढ़ा रहा था और आवाज देकर कहने लगा। "लाली आज लाला की तबियत ठीक नही है। डॉक्टर को घर बुला ले।"
लाला की तबियत देख लाली घबरा गई। चिंटू घर में नही था। वह सिनेमा देखने गया था। लाली ने लाला को पानी दिया। उसने रिक्शेवाले से डॉक्टर घर बुलाने को कहा। लाला बिस्तर पर लेट गया। लाला की बैचैनी बडी और उसने दम तोड़ दिया।

रिक्शेवाला डॉक्टर के साथ आया। डॉक्टर ने लाला की मृत्यु पर मुहर लगा दी। घर में हाहाकार मच गया। सभी नजदीकी रिश्तेदार एकत्रित हो गए। चिंटू का कोई अतापता नही था। मित्रों संग सिनेमा देखने गया था। रात एक बजे घर लौटा। लडखडाते चिंटू को देख उसकी मां उसको अंदर कमरे में ले गई।
"क्या हालत बना रखी है?"
बिस्तर पर लुढकते हुए चिंटू ने कहा "क्या हुआ?"
"लाला मर गया औऱ तेरा कोई अतापता नही, कहां मटरगस्ती कर रहा था। चुप करके सो जा। सुबह कोई नाटक नही होना चाहिए।"
उसकी मां ने उसके हाल पर पर्दा रख दिया।
अगली सुबह लाला का अंतिम संस्कार कर दिया।

लाला की मृत्यु के पश्चात लाली ने चिंटू को दुकान संभालने के लिए कहा। बेमन चिंटू दुकान पर बैठ तो गया लेकिन मन उसका दोस्तों के साथ घूमने में लगता था। दुकान जल्दी बंद करके दोस्तों संग सिनेमा और दारू पीने जाता। एक तरफ दुकान जल्दी बंद करने के कारण बिक्री घट गई, दूसरी तरफ मौज मस्ती पर रुपये ख़र्च होने लगे। लाली के हाथ रुपये रखने बंद कर दिए।
एक दिन जैसे चिंटू सुबह के समय उठा। लाली ने चिंटू से अपने देवर-देवरानी के सामने दुकान की बात की।
लाली - "चिंटू अब दुकान पर पूरा धयान दिया करो जैसे लाला दिया करते थे।"
अलसाई हालात में चिंटू - "लाली सुबह नींद तो खुली नही, शोर मचाना शुरू कर दिया।"
लाली - "दुकान जल्दी बंद कर देते हो। घर में रात को एक बजे से पहले आते नही हो। मेरे हाथ में रुपये रखते नही हो। आखिर दुकान की कमाई का क्या करते हो?"
लाली की बात सुन देवर-देवरानी थोड़ा नाराज हो गए।
"लाली बच्चा है। खेलने के दिन हैं। सब ठीक हो जाएगा, दुकान संभाल तो रहा है।"
मां-बाप के समर्थन मिलते चिंटू का हौसला दुगना हो गया। थोड़े दिन बाद उसने लाली को रुपये देने बंद कर दिए।
लाली रात को चिंटू के आने का इंतजार कर रही थी। लगभग दो बजे शराब के नशे में धुत लडखडाता हुआ चिंटू आया।
लाली - अब तू शराब भी पीने लगा है?"
चिंटू - "कौन सा तेरे बाप की कमाई से पी रहा हूं। खुद कमाता हूं मैं।"
लाली - "मुझे रुपये देता नही सब शराब में उड़ा रहा है।"
चिंटू - "भूखी तो नही मर रही है। भरपूर खाना मिल रहा है, रहने की जगह भी है और क्या चाहिए बुढ़िया तुझे? चैन से पीने भी नही देती। चल हट परे हो।"
चिंटू ने लाली को हाथ से हटाया। पतली दुबली लाली गिर पड़ी। लाली ने शोर मचाया - "अब तू मुझे मारने लगा है  मां हूं तेरी।"
शोर सुनकर देवर-देवरानी भी उठ गए। दोनों एक स्वर में - "लाली रात को सोने भी नही दे रही है। शोर क्यों मचा रखा है?"
लाली - "चिंटू को देखो औऱ संभाल लो। इतनी छोटी उम्र में रोज शराब पीता है। दुकान की कमाई शराब में उड़ा रहा है। मुझे भी रुपये नही देता है। ऐसे तो खजाने भी खत्म हो जाते है।"
देवरानी - "लाली तू खजाना मत देख। उम्र देख अपनी, क्या बांध कर ऊपर ले जाएगी।"
लाली - "राम राम, क्या कह रहा है तू? लाला ने मेहनत करके दुकान बनाई। पूरे बाजार में लाला के नाम से दुकान चलती है और चिंटू लाला के नाम पर बट्टा लगा रहा है।"
देवरानी -"बुढ़िया तू चुप कर जा। तेरे को भूखा नही मारेंगे। चिंटू से सब हिसाब लेते हैं हम। तू चिंटू को खाता-पीता नही देख सकती।"
देवर - "चिंटू तू जाकर सो जा। इसका रोना-धोना खत्म नही होगा।"
देवरानी -"चलो जी खड़े हुए तमाशा देखने में मजा रहा है।"

सभी अपने कमरों में चले गए लेकिन लाली चुपचाप वहीं फर्श पर लेटी आंसू बहाती रही और लाला को याद करती रही। लाला तुम मुझे अकेला क्यों छोड़ गए। साथ लेते जाते। क्या करूं लाला बता तू, क्या करूं, क्या करूं। लाली घटनाओं पर अवलोकन करती रही और सुबह हो गई। उसको अपनी सुध नही थी, खुद कहां और कपड़े कहां। पूरी रात जगती रही। सुबह उठ कर देवर-देवरानी लाली पर भड़क पड़े।
"लाली यह नौटंकी बंद कर। लाला ने खुद दुकान चिंटू को दी है। अब उसकी मर्जी जैसे दुकान चलाये। दो वक्त की रोटी मिल रही है। भूखी नही मरेगी।"
लाली चुपचाप उठ कर अपने कमरे में चली गई। चुपचाप बिस्तर पर लेटे हुए दीवारे देखती रही और लाला को याद करती रही और बड़बड़ाती रही। दो दिन कुछ नही खाया। दुबला पतला शरीर कमजोर पहले ही था अब उसमें जान ही नही रही। लगभग बेहोशी की हालत में लाली बड़बड़ाए जा रही थी। लाली की बिगड़ी तबियत देख देवर-देवरानी के होश उड़ गए कि यदि बुढ़िया टपक गई तब उनके माथे दोष मढ़ा जाएगा। डॉक्टर को बुलाया गया। डॉक्टर ने फौरन अस्पताल में भर्ती करा दिया। नली द्वारा दवा और खाना दिया गया।

दो दिन बाद लाली की तबियत स्थिर हुई और लाली घर गई। घर में देवर-देवरानी लाली पर गर्म हो गए।
"लाली भूखी रह कर हमें धमकी मत दो। हम तुम्हारी इन हरकतों से डरने वाले नही है। दो दिन अस्पताल में पैंतीस हज़ार रुपये का बिल गया, कोई खबर है कि नही। कौन भरेगा रुपये?"
लाली कुछ नही बोली बस दोनो का मुख ताकती रही।
"जब से लाला मरा है मुझे कितने रुपये दिए और कितने अपने पास रखे मुझे नही मालूम। मुझे बस इतना मालूम है कि पिछले दो-तीन महीने से एक फूटा रुपया भी नही दिया। हां दुकान की कमाई सब तुम रख रहे हो और चिंटू की मुझे चिंता है। इस छोटी सी उम्र में इतनी शराब पीना अच्छी बात नही है, उसे समझाओ। मेरी फिक्र करना छोड़ दो, बस एक काम कर दो। मुझे हरिद्वार की बस में बिठा दो और थोड़े रुपये दे दो, कुछ दिन हरिद्वार में प्रभु का चिंतन करूंगी।"
देवर ने तुनक कर कहा - "लाला के साथ तुम्हारा बैंक में खाता है। चार लाख रुपये जमा कर रखे हैं। हमें बताया तक नही। हवा दिखा इनको नही तो सीलन लग जायेगी। हमने कोई रुपये नही देने। यह तो पासबुक मेरे हाथ लग गई तब मुझे मालूम हुआ। अस्पताल का खर्चा भी हमारे पल्ले डाल दिया।"
लाली ने धीरे से जवाब दिया - "ईश्वर तुम्हे सतबुद्धि दे। दो चार दिन बाद तबियत थोड़ी ठीक हो जाये मैं हरिद्वार चली जाउंगी।"

देवर-देवरानी तीव्र गति से उसके कमरे से विदा हुए और लाली सोचने लगी। लाला हिसाब का पक्का था। उसने मेरे साथ बैंक में जॉइंट एकाउंट खोला था और एक बैंक लॉकर भी था। दुकान और बैंक के काम लाला खुद करता था, मुझे तो कभी कभार बैंक ले जाता था। लाला हमेशा कहता था, घर और बच्चे औरत संभाले, दुकान मर्द संभाले। जो मांगती थी लाला देता था, मुझे कभी जरूरत ही नही पड़ी दुकान देखने की। लाला भी कभी रसोई में नही झांकता था।
अगले दिन लाली ने देवर से बैंक पासबुक मांगी। देवर ने अस्पताल में खर्च हुए रुपये का तकाजा किया। लाली ने दो टूक कह दिया -  "तुमने कोई अहसान नही किया अस्पताल का खर्च उठा कर। लाला को मरे पांच महीने हो गए, दुकान की सारी कमाई तुमने अपने पास रखी है और  चिंटू ने शराब में उड़ाई है, उस हिसाब में मेरे अस्पताल का खर्च भी लिख लो।"
देवरानी लाली का मुख देखती रह गई कि लाली में इतनी हिम्मत कैसे आई।

दो दिन बाद लाली ने बैंक जाकर बैंक अधिकारी से अपने खाते की जानकारी ली। बचत खाते में चार लाख रुपये जमा थे और फिक्स्ड डिपाजिट में भी चार लाख रुपये थे। हरिद्वार यात्रा के लिए कुछ रुपये बैंक से निकले। लॉकर खोल कर देखा। लॉकर मैं दुकान के कागज थे और कुछ नही था। कागज निकल कर लॉकर खाली करके बैंक को वापिस कर दिया।

सुबह सब सो रहे थे। तड़के पांच बजे लाली ने बिना किसी को बताए घर से रुक्सत ली। गली से बाहर आने पर उसने बस अड्डे जाने के लिए रिक्शा लिया। दस मिनट में लाली बस अड्डे पर थी। पहली बस पकड़ कर हरिद्वार के लिए रवाना हो गई।
पांच घंटे बाद लाली हरिद्वार पहुंच गई। बस अड्डे से रिक्शा पकड़ कर भवन पहुंची। लाली लाला के संग हर वर्ष हरिद्वार आती थी इसलिए भवन प्रबंधक लाली को जानता था। लाली ने कमरे में समान रखा औऱ आराम करके सफर की थकान मिटाई।

शाम को भवन के मंदिर में बैठ प्रभु भजन गुनगुनाने लगी। लाली भजन में मगन थी उसके समीप एक युवा जोड़ा आकर बैठ गया।  कुछ देर बाद लाली ने आंख खोली।
लाली - "मन्नू कब आये?"
मन्नू - "लाली आंटी अभी आये हैं। कल सुबह मसूरी जाएंगे।"
लाली - "आजकल कहां हो?"
मन्नू - "लाली आंटी अब मैं नोएडा गया हूं आपके पड़ोस में।"
लाली - "पहले बैंगलोर में थे ?"
मन्नू - "हां अब अच्छी नौकरी नोएडा में मिल गई है।"
लाली - "खूब तरक्की करो। ईश्वर बरकत दे।" लाली ने मन्नू और उसकी पत्नी को ढेरों आशीर्वाद दिए।
मन्नू लाली की बहन का पुत्र था। अगले दिन वो दोनों मसूरी चले गए।

भवन प्रबंधक श्रीराम और लाला दोनों बचपन के मित्र थे। एक साथ स्कूल में पढ़ा करते थे। स्कूल की पढ़ाई के पश्चात लाला ने दुकान खोल ली और श्रीराम भवन का प्रबंधक बन गया। श्रीराम परिवार सहित भवन में रहता था। दो कमरे श्रीराम के परिवार को स्थाई रूप से आवंटित थे। श्रीराम और लाला दोस्त और भाई दोनों थे। परिवार के हर सुख और दुख आपस में बंटाते थे।
श्रीराम ने लाली को दो दिन तक चुपचाप देख पूछा तब लाली की आंखों से आंसू निकलने लगे। लाली की व्यथा सुन श्रीराम की आंखें भी छलक गई।
श्रीराम - "लाली यह तो देवर-देवरानी बहुत गलत कर रहे हैं।"
लाली - "लाला के बाद नजरें बदल गई हैं। मैं दुकान चलाना क्या जानूं, इसी का फायदा उठा रहे हैं। चिंटू मां-मां कहते दौड़ता था औऱ आज शराब पीकर आंखें दिखलाता है। आज रोटी दे रहे हैं मालूम नही कल यह भी बंद कर दे। अब तो रुपया ही उनका दीन, धर्म और माई बाप है। रिश्ते रुपये के तराजू में चलते पहली बार देखें हैं। जब तक लाला था तब तक दिमाग इस तरफ गया ही नही। कुछ समझ नही आता कि क्या करूं?"
श्रीराम - "समस्या गंभीर है। समाधान मुझे अभी समझ नही रहा।"
लाली - "कुछ तो करना पड़ेगा नही तो गंगा जी में समा जाना होगा?"
श्रीराम - "लाली ऐसा नही कहते। ईश्वर ही कठिन दिन दिखलाता है वही नया रास्ता बतलाता है।"
लाली - "मालूम नही वो दिन कब आएगा?"
श्रीराम - "निराश मत हो लाली आस रख।"
चार दिन बाद मन्नू मसूरी से वापिस आया और लाली से कुछ दिन उसके साथ नोएडा में गुजारने का अनुरोध किया। श्रीराम के कहने पर लाली ने अनुरोध स्वीकार किया।
श्रीराम - "लाली अकेले जीवन काटना बहुत मुश्किल है। थोड़े दिन तुम मन्नू के संग रहो फिर दूसरे रिश्तेदारों से मिलो। जिसके संग मन रमे, वहां रहो। कुछ माहौल बदलेगा तब विचार बदलेगा और सकारात्मक सोच से नई ऊर्जा उत्पन्न होगी। मैं कुछ सोचता हूं इस विषय पर और तुम्हारे देवर से बात भी करूंगा।"
लाली मन्नू के संग नोएडा चली गयी। श्रीराम की सलाह लाली को रास आई। मन्नू औऱ उसकी पत्नी मानवी दोनों नौकरी करते थे। सुबह आठ बजे घर से निकलते और वापिस रात आठ बजे आते। लाली उनके लिए खाना बनाती और घर के कुछ काम भी करने लगी। मन्नू और मानवी से लाली को इज्जत मिली। लाली आंटी लाली आंटी के गुण सबके सामने गाते, जिसे सुन लाली का सीना गर्व से फूल जाता। लाली को रुपये तो नही देते पर लाली का पूरा खर्च वे स्वयं करते।

लाली मन्नू और मानवी के संग रह खुश थी। सोचने लगी एक तरफ देवर-देवरानी ने उसका जीना दूभर कर दिया था। सब कुछ उनका ही तो था, दुकान और उसकी कमाई, चिंटू को ही तो मिलना था। मेरा क्या खर्च, सिर्फ दो समय का निवाला और दो जोड़ी कपड़े। उन्हें वो भी पसंद नही आया। चिंटू को पुत्र की तरह पाला और एक मन्नू है जो उसकी बहन का पुत्र है और उसे अपनी मां से भी बढ़ कर इज्जत दे रहा है। उसे जहां इज्जत मिले वहीं रहना चाहिए।

दुकान लाला के नाम थी जो स्वयं उसने खरीदी थी। मकान किराये का था जिसमें लाली देवर-देवरानी के परिवार के साथ रहती थी। किरायानामा देवर के नाम था। लाली सात-आठ महीने बाद फिर से हरिद्वार गई। भवन में श्रीराम ने उसका कुशलक्षेम पूछा।
लाली - "श्रीराम भाई अब मैं एक नई दुनिया मे जी रही हूं। देवर-देवरानी ने एक तरफ जीना दूभर कर दिया था और यहां मन्नू-मानवी ने सिर-आंखों पर बिठाया हुआ है। सब जरूरतों का ध्यान रखते हैं।"
श्रीराम - "लाली फिर भी चौकस रहना। दोनों नौकरी करते हैं इसलिए उन्हें घर संभालने के लिए तुम्हारी जरूरत है।"
लाली  -"श्रीराम भाई मैं समझती हूं। मेरी बहन उनके साथ रह नही सकती। जीजा और छोटे बच्चों की देखभाल के कारण मन्नू के साथ रह नही सकती। श्रीराम भाई यदि मेरे अपने बच्चे होते तब भी मैं उनका घर और बच्चे संभालती। प्रकृति का नियम है कुछ पाने के लिए कुछ देना पड़ता है। कुछ प्यार पाने के लिए कुछ प्यार तो देना पड़ेगा।"
श्रीराम - बुरा मत मानना एक बात कहूं?"
लाली -"श्रीराम भाई बेझिझक कहो।"
श्रीराम  -"तुम मन्नू के पास रह रही हो, दुकान लाला की खरीदी हुई है, तुमने उसे चलाना नही है तो मेरी सलाह उसको बेच कर रकम बैंक में फिक्स्ड डिपाजिट करके ब्याज की रकम से अपना गुजारा करो ताकि किसी पर मोहताज नही बनोगी तब सभी तुम्हारी इज्जत करेंगे। तुम अपनी इच्छानुसार जिंदगी गुजार सकोगी।"
लाली - "श्रीराम तुम्हारी राय सो टके सही है। इसमें तुम्हे मेरी मदद करनी होगी। दुकान का खरीददार ढूंढना और फिर सौदा करना, रकम लेनी, यह सब मैं अकेली जान नही कर सकूंगी।"
श्रीराम ने हामी भरी और दिल्ली में अपने परिचत जनों को दुकान बेचने का जिम्मा सौंपा।

चिंटू अपनी गलत आदतों के कारण दुकान पर कम ध्यान देता था। नशे में लाभ और पूंजी खत्म हो गई। दुकान में नया सामान आया नही जिस कारण ग्राहक धीरे-धीरे कम होते गए और दुकान बंद हो गई। लाली यह सुन कर सन्न रह गई कि दुकान पिछले चार महीने से बंद है और उस पर ताला पड़ा है। लाली को बाजार में पड़ोसी दुकानदार जानते थे। उनकी गवाही में दुकान के ताले की दूसरी चाबी बनवाई। दुकान खुली और खाली मिली। खाली दुकान देख लाली रो पड़ी। जिस दुकान पर लाला में अपनी जिंदगी और जान लगा दी थी उसको उसी के चहेते लाडले भतीजे चिंटू, जिसे अपने बेटे से भी अधिक माना और समझा, ने हर रोज अंडे देने वाली मुर्गी को हलाल कर दिया। श्रीराम की मदद से लाली ने दुकान बेच दी और प्राप्त रकम को बैंक में जमा करा दी। इस तरह लाली ने अपने भविष्य को सुरक्षित कर लिया।

लाली के देवर-देवरानी को जब दुकान बिकने की खबर मिली तब बहुत देर हो चुकी थी। लाली मन्नू और मानवी के साथ रहने लगी। चार-: महीने बाद हरिद्वार औऱ ऋषिकेश जाकर कुछ समय व्यतीत करती और फिर वापिस मन्नू-मानवी के पास लौट आती।

लाली का जीवन ईश्वर भक्ति के साथ मन्नू-मानवी के साथ प्रेम से बीतने लगा।
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