Monday, July 02, 2018

विवाह उपरांत पढ़ाई



अनुप्रिया पढ़ने में होशियार थी। हर वर्ष स्कूल में प्रथम स्थान पर रहती थी। पढ़ाई के प्रति उसकी लगन कॉलेज में भी कम नही हुई। उसकी इच्छा दिल्ली के सबसे अच्छे और प्रतिष्ठित  कॉलेज में पढ़ने की थी लेकिन परिवार ने घर से दूर पढ़ने की अनुमति नही दी। न चाह कर भी उसे सोनीपत के स्थानीय कॉलेज में पढ़ना पढ़ा। पढ़ाई के प्रति लगन कम नही हुई। मन पसंद कॉलेज में दाखिला मिलने के बावजूद परिवार ने उसका दाखिला नही करवाया कि लड़की है, हर रोज दो-ढाई घंटे कॉलेज पहुँचने में लग जाएंगे। हर रोज चार से पांच घंटे तो आने जाने में लग जाएंगे। घर के पास कॉलेज में उसका दाखिला करवाया।

कॉलेज में जहाँ छात्र मौज मस्ती में रहते थे वहां अनुप्रिया सदा पुस्तकों संग रहती थी। क्लास या फिर लाइब्रेरी में ही अनुप्रिया रहती थी। प्रथम वर्ष की परीक्षा के कुछ दिन पहले जहाँ छात्रों ने पुस्तकों को हाथ लगाया वहां अनुप्रिया ने एक मीठी मुस्कान के संग पुस्तकों को विराम दिया। परीक्षा के पश्चात लगभग डेढ़ महीना परीक्षाफल आने तक अनुप्रिया ने घर के काम सीखे और साथ में द्वितीय वर्ष की पुस्तकें पढ़नी शुरू कर दी।

आखिर परीक्षाफल आ ही गया। अनुप्रिया ने किसी को निराश नही किया। वह कॉलेज में ही नही बल्कि पूरे विश्विद्यालय में प्रथम रही। अनुप्रिया का हौसला बढ़ता गया। द्वितीय और तृतीय वर्ष में भी अनुप्रिया प्रथम रही। अनुप्रिया आगे और पढ़ना चाहती थी लेकिन उसका परिवार उसके हाथ पीले करने के सपने देख रहा था। बीए के बाद उसको आगे नही पढ़ने दिया। परिवार की निगाह में लड़की का विवाह जितनी जल्दी हो उतना ही अच्छा। यह तो अनुप्रिया की पढ़ने की धुन ने उसके परिवार को बीए तक रोक लिया वर्ना उसके परिवार में चाचा, ताऊ की लड़कियों की शादी स्कूल की पढ़ाई के फौरन बाद ही हो गई। उसके परिवार को चिंता होने लगी कि यदि अनुप्रिया पढ़ती रही तब कहीं दूसरे धर्म या जाति में स्वयं विवाह न कर बैठे। इसलिए उसके परिवार ने उसकी एक नही सुनी औऱ बीए के रिजल्ट आते ही उसका विवाह कर दिया।

विवाह होते उसने सोचा कि अब आगे पढ़ने का उसका सपना अधूरा ही रह गया और गृहस्थ जीवन मे पति-बच्चों तक ही उसकी जिंदगी सिमट जाएगी।

विवाह के पश्चात कुछ दिन अनुप्रिया पानीपत रही और उसके बाद पति आनंद के संग दिल्ली रहने आ गई। पति आनंद दिल्ली में कार्यरत था। सोनीपत के अपने संयुक्त परिवार और बड़े मकान के बाद पानीपत ससुराल में संयुक्त परिवार और बड़े मकान में कुछ दिन रहने के पश्चात दिल्ली में एक छोटे से फ्लैट में रहना अनुप्रिया को अजीब लगा। डीडीए का एक छोटा सा एलआईजी फ्लैट जो शुरू होने से पहले ही समाप्त हो जाता है। दरवाजा खोलते ही छोटी सी बैठक, उसके पीछे छोटा सा बैडरूम जहां डबल बेड के अतिरिक्त सिर्फ कपड़े रखने की अलमारी ही थी। एक छोटी सी रसोई और छोटा सा बाथरूम।

पानीपत से दिल्ली आते-आते रात के आठ बजे गए थे। रात का खाना आनंद पानीपत से पैक करवा के ले आया था कि देर रात पहुंचने और थकान के कारण खाना कौन बनाएगा। ढाबे या होटल के खाने से घर का खाना अच्छा है इसलिए रात का खाना घर से ले आये थे। थकान के कारण खाना खाने के पश्चात आनंद औऱ अनुप्रिया ने थोड़ी देर बातें की और फिर एक दूसरे की बाहों में सिमट गए।
आनंद अभी दो दिन और छुट्टी पर था। अगली सुबह आनंद फ्लैट के समीप बाजार से फल-सब्जी ले आया और अनुप्रिया की गृहस्थी आरम्भ हो गई।
"अनु रसोई कला में तो तुम माहिर हो। सब्जी और दाल एकदम बढ़िया औऱ स्वादिष्ट हैं।"
"लगता है कुछ अधिक तारीफ कर रहे हो।"
"नही अनु एकदम दिल से अच्छे खाने की तारीफ निकली है। झूठ नही कह रहा हूँ।" आनंद ने अनुप्रिया को बाहों में जकड़ लिया।"
"यह कोई समय है कोई बाहों में लेने का? अनु ने आनंद की बाहों से निकल कर कहा।
"प्रेम के लिए एकांत का हर पल उपयुक्त होता है।" कह कर आनंद ने अनु को फिर से बाहों में जकड़ लिया।

दिल्ली में पहला दिन तो प्रेमालाप में बीत गया। अगली सुबह आनंद अभी नींद में था लेकिन अनुप्रिया उठ कर घर के कामों में व्यस्त हो गई। उसने अपने सूटकेस खोले और कपड़ो को अलमारी में समेटने के लिए जैसे आलमारी खोली वह स्तब्ध हो गई। आधी अलमारी में आनंद के कपड़े और समान था और आधी अलमारी में पुस्तकें थी। वह एक-एक करके पुस्तकें देखने लगी। आईएएस परीक्षा की तैयारी की पुस्तकों के साथ अर्थशास्त्र, इतिहास, वाणिज्य, हिंदी, अंग्रेजी और कानून की पुस्तकों के साथ रामायण, गीता, आध्यात्मिक और उपन्यास से आधी अलमारी भरी हुई थी। अनुप्रिया पुस्तकों में उलझी हुई थी। आनंद की नींद खुली और उसने अनुप्रिया को बाहों में लिया। पुस्तकों के ढेर संग अनु आनंद के ऊपर लुढक गई। पुस्तकों के बीच दोनों खिलखिला के हंस पड़े।
"ये सब पुस्तकें आपकी हैं?" अनुप्रिया ने उत्सुकता से पूछा।
"हां मेरी ही हैं।" आनंद ने मुस्कुरा कर पूछा।
"मुझे तो किसी ने बताया ही नही कि आप इतने पढ़ते थे।"
"मिस पढ़ाकू पढ़ते तो हम भी थे लेकिन विश्विद्यालय में प्रथम नही आए। लेकिन अनुप्रिया जब तुम पूरे विश्विद्यालय में प्रथम आई तब आगे पढ़ाई क्यों नही की?"
"क्योंकि आपकी श्रीमती जो बनना था।"
"मजाक छोड़ो, सच में बताओ, पढ़ाई क्यों छोड़ी?"
"घर वालों को पसंद नही था। हमारे परिवार क्या पूरे गांव में पढ़ने की परंपरा ही नही है। मैं परिवार के विरुद्ध नही जा सकी।"
"आगे पढ़ना चाहती हो?"
"मेरे चाहने से क्या होगा?"
"आगे पढाई होगी और क्या।"
"क्या यह संभव है?" अनुप्रिया की आंखों में आश्चर्य के भाव थे।
"अनु इस वर्ष तो विश्विद्यालय में दाखिला नही हो सकेगा। समय निकल चुका है। अगले वर्ष अपने मनपसंद विषय मे दाखिले की कोशिश करना।"
"क्या आप मुझे आगे पढ़ने दोगे?"
"बिल्कुल पढ़ने दूंगा।"
"सच्ची में?"
"बिल्कुल सच्ची मुच्ची।"
आगे पढ़ने की अनुमति मिलते ही अनुप्रिया खुशी से झूम गई और आनंद से लिपट गई।
"अच्छा आपने अपने बारे में कुछ बताया ही नही कि कितना पढ़े हैं और कहाँ काम करते हैं?"
"कमाल है तुम्हारे घर वालों ने कुछ बताया ही नही क्या"?"
"सच्ची में कुछ नही बताया। बस इतना बताया था कि लड़का अच्छा कमाता है और देखने में सुंदर है।"
"जब मैं तुम्हे देखने आया था तब पूछ लेती?"
"क्या पूछती?" अकेले में मिलने ही नही दिया था। पूरे घर वालों के सामने क्या बात करती?"
"यह बात तो है, तुम्हारे घर वाले पुराने खयाल के हैं। मुझे भी तुम्हारे साथ बात नही करने दी।"
"तो फिर पसंद क्यों किया?"
"देखने में ठीक ठाक थी और विश्विद्यालय में प्रथम रही तभी तुम्हारे संग विवाह की हामी भर दी।"
"और तुमने?"
"घर वालों ने पहले ही कह दिया था कि लड़के के बारे में सभी जानकारी जुटा ली है। शरीफ लड़का है, अच्छा कमाता है, शराब सिगरेट नही पिता। देखने में तुम्हारे से अधिक सुंदर है। लड़का हाँ बोले तो झट से हाँ बोल देना।"
"अच्छा सुबह की चाय स्वयं बनानी होगी या श्रीमती जी थोड़ा कष्ठ करेंगी?"
"थोड़ा क्या पूरा कष्ठ करेगी। चाय, नास्ता, लंच और डिनर श्रीमती की जिम्मेवारी है।"
चाय पीते हुए अनुप्रिया आनंद से उसकी पुस्तकों के बारे में पूछा।
"बी.कॉम के बाद कानून की पढ़ाई की। एलएलबी के साथ प्रतियोगिताओं की भी तैयारी की लेकिन असफल रहा। बी.कॉम और एलएलबी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की लेकिन सभी एंट्रेंस परीक्षाओं में असफल रहा। एलएलबी के बाद एलएलएम में भी प्रथम श्रेणी में पास हुआ। परिवार पर कब तक बोझ बन कर रहता। एलएलएम के बाद लॉ फर्म में नौकरी कर ली। सोचता हूँ थोड़ी रकम बचा लूं फिर वकालत की प्रैक्टिस ही शुरू कर दूं।"
"हमें तो मालूम ही नही था कि हमारे सैयां वकील साहब हैं।"
"अभी तो मेरे पास तलाक के केस हैं। किसी सहेली या रिस्तेदार का तलाक करवाना हो तो कम फीस में मुकदमा कर दूंगा।"
अनुप्रिया खिलखिला दी। दो दिन बाद आनंद ने ऑफिस जाना शुरू कर दिया। अनुप्रिया ने छोटे से फ्लैट को दो दिन में चकाचक चमका दिया और अलमारी में अपने और आनंद के कपड़े व्यवस्थित करके बैठक में पुस्तकों के लिए बाजार से एक शोकेस खरीद लिया।
"पत्नी गृहणी हो तब विवाह के बाद घर स्वर्ग बन जाता है। अकेला रहता था कभी घर को व्यवस्थित करने की जरूरत नही समझी। सुबह ऑफिस जाना और रात को आना। रविवार को पूरे सप्ताह के कपड़े धोना, साफ सफाई। यहां तो दो दिन में ही घर की नई शक्ल निकल आई है।" आनंद ने अनुप्रिया की तारीफ की।
"देखो यह तो गृहणी का कर्तव्य है। इसमें तारीफ की कोई आवश्कयता नही है। मुझे आपके मार्गदर्शन की जरूरत है।"
"बताओ किस मुद्दे पर सलाह लेनी है। वकील हूँ सलाह की फीस लगेगी।"
"कौन सी और कितनी फीस लोगे?"
"पति-पत्नी का प्रेम ही फीस है।" आनंद ने अनुप्रिया को बाहों में कैद करते हुए कहा।
"देखो आप तो ऑफिस सुबह नौ बजे चले जाते हो और रात आठ बजे वापस आते हो। घर का काम दो घंटे में सिमट जाता है और विश्विद्यालय का अगला सत्र में अभी आठ महीने हैं। मुझे क्या करना चाहिए? आप की क्या राय है?"
"अनु मैं तो आईंएएस और जुडिशरी दोनों में असफल रहा। हो सकता है कि मेरी किस्मत में शायद वकालत लिखी है। तुम पढ़ने में होशियार हो। स्वयं पढ़ाई करके तुम विश्विद्यालय में प्रथम रही। यदि चाहो तो घर बैठ कर आईंएएस की तैयारी कर सकती हो। मुझे यकीन है कि तुम बिना कोचिंग के सफलता प्राप्त कर सकती हो। पुस्तकें और आ जाएंगी।"
सप्ताह के छ दिन आनंद जब ऑफिस होता तब अनुप्रिया पुस्तकों में उलझ जाती। हालांकि आनंद प्रतियोगिताओं में असफल रहा लेकिन उसका अनुभव अनुप्रिया के बहुत काम आया। आनंद अनुप्रिया का अध्यापक, कोच और गुरु बन कर मार्ग दर्शन करने लगा। पति-पत्नी का रिश्ता सिर्फ रविवार की छुट्टी वाले दिन तक सीमित हो गया। रविवार को दोनों दिल्ली घूमते और बाहर खाना खाते। छ महीने तक अनुप्रिया ने दिल्ली के सभी पर्यटक स्थल देख लिए औऱ पढ़ाई में भी बहुत आगे निकल गई।

अनुप्रिया का अपने मायके भी संपर्क बहुत कम हो गया। उसके माता-पिता को चिंता सताने लगी कि जब से दिल्ली गई है मायके आना ही नही हुआ। दीवाली पर भी नही आई। फोन पर भी कुछ सेकंड ही बात करती। स्थिति का जायका लेने के लिए पूरा परिवार ने अनुप्रिया के घर बिना बताए छापा मारा। घर पर अनुप्रिया पुस्तकों में उलझी हुई थी। जिस परिवार ने उसे आगे पढ़ने नही दिया, उसे उसके पति ने आगे पढ़ने के लिए प्रेरित किया। क्योंकि उनको इस बात की कतई उम्मीद नही थी। आनंद का परिवार पानीपत रहता था और आनंद अकेला ही दिल्ली में रहता था। अनुप्रिया ने दो टूक अपने परिवार को कह दिया कि उसका मकसद कुछ बनना है जिसमें आनंद का भरपूर सहयोग है। वह अब अपने मायके कुछ बन कर ही आएगी।
"तू यह क्या कह रही है? लड़कियां मायके से संबंध कैसे तोड़ सकती हैं। लड़के परिवार से अगल होते है लेकिन लड़कियां तो अपने मायके से जुड़ी रहती हैं।" उसके परिवार ने उसे समझाया।
"मैं आपसे दूर कहाँ हो रही हूँ। मैं तो सिर्फ कुछ बनने के लिए एकांत में पढ़ना चाहती हूं। आपने जंवाई खुद जांच परख कर चुना है और उसी जंवाई ने पहले ही दिन मेरी प्रतिभा को जांच लिया है।"
अनुप्रिया का परिवार वापस चला गया और अनुप्रिया पढ़ने में व्यस्त हो गई। उसके जीवन में सिर्फ पढ़ाई समाई हुई थी। मायका और ससुराल दोनों छूट गए। छोटे से फ्लैट में पुस्तकों में डूबी रहती। अडोस-पड़ोस से भी कोई मतलब नही। अड़ोसी-पड़ोसी और रिश्तेदारों ने अनुप्रिया को पागल घोषित कर दिया। एक नवविवाहित युवती सिर्फ पढ़ने में अपना सर खपा रही है। उसके साथ आनंद को भी जोरू का गुलाम घोषित कर दिया कि वह भी अनुप्रिया को संरक्षण दे रहा है। अच्छी नौकरी और तनख्वा है, क्या जरूरत है नवविवाहिता से पढ़ाई करवाने की। सारे रिश्ते तोड़ दिए। किसी से मेल मिलाप नही है।

आनंद और अनुप्रिया दुनिया की नजर में पागल और मानसिक रोगी थे और उनकी नजर में दुनिया पागल थी।
एक दिन अनुप्रिया की तबियत थोड़ी खराब हुई। डॉक्टर के पास चेकअप के लिए गए तो खुशखबरी मिल गई। अनुप्रिया गर्भवती थी।
"आनंद अब पढ़ाई में रुकावट आ जाएगी।" अनुप्रिया ने चिंता जाहिर की।
"किस बात की रुकावट?" आनंद ने बेपरवाह हो कर पूछा।
"मेरा मतलब कि थोड़ा आराम करना होगा और बहुत परहेज रखना पड़ता है।"
"तू चिंता क्यों करती है। घर का काम होता ही कितना है। हम दो जने हैं। अगर तुझे तकलीफ होगी तब हाथ बटाने के लिए मैं हूँ। यदि किसी सहायक की जरूरत हुई तो नौकर रख लेंगे। पढ़ाई तो बिस्तर पर बैठ या लेट कर ही होनी है। आराम और ज्ञान एक साथ।"
आनंद की बात सुनकर अनुप्रिया सोचने लगी तब आनंद ने प्यार और मजाक के मिश्रण में कहा। "पढ़ाई की तरफ ध्यान दे। बच्चा गर्भ में ही पढ़ाई के गुण सीख लेगा। अभिमन्यु की तरह सीख कर दुनिया में प्रदापर्ण करेगा।"
"तुम यह कैसे कह सकते हो?"
"खैर इस विषय को छोड़ कर तुम आराम और पढ़ाई करो।"
दिन बीतते गए। अनुप्रिया की परीक्षा का समय आ गया। गर्भ के आठवें महीने परीक्षा शुरू हो गई। डॉक्टर ने परीक्षा छोड़ने की सलाह दी लेकिन आनंद ने अनुप्रिया को परीक्षा में बैठने की सलाह दी। आनंद अनुप्रिया की हर परीक्षा में साये की तरह साथ रहा। अनुप्रिया के परीक्षा केंद्र के बाहर आनंद बेताबी से इंतजार करता रहता। परीक्षा केंद्र पर हर निगाह अनुप्रिया पर टिकती कि इस हालात में उसे परीक्षा देने की क्या जरूरत है। उसे जोखिम नही लेना चाहिए। आनंद की सोच थी कि जब अनुप्रिया की पूरी तैयारी है और वह स्वयं पर भरोसा कर रही है तब एक वर्ष का और इंतजार नही करना चाहिए। यदि परीक्षा में असफल रहती है तब देखा जाएगा। उसे भरोसा था कि जो वह नही कर सका उस मुकाम को अनुप्रिया अवश्य हासिल करेगी। वह अनुप्रिया की लगन, जोश और जज्बे को मंद नही करना चाहता था। उसे डर था कि कहीं एक बार जोश ठंडा हो गया वह दुबारा नही आएगा। उसके साथ स्वयं भी ऐसा हुआ था। बार बार असफल होने पर उसका उत्साह ठंडा हो गया था। वह अनुप्रिया के पढ़ाई के उत्साह को किसी भी हालात में कम नही देखना चाहता था।

आज अनुप्रिया का अंतिम पेपर था औऱ सुबह उठते ही उसको अपनी तबियत ठीक नही लग रही थी। अब कभी भी प्रसव का समय आ सकता है। आनंद ने प्रेम से उसका उत्साह बढ़ाया और परीक्षा भवन ले गया। अनुप्रिया ने ईश्वर की स्तुति करके पेपर देना शुरू किया। उसकी लगन ही थी कि वह पेपर संपन्न कर सकी। परीक्षा केंद्र से सीधे डॉक्टर के पास जाना पड़ा।
"कहो पेपर कैसे हुए?" डॉक्टर ने चेकअप करते हुए पूछा।
"बस दे दिए।"
"अगली बार दे देती?"
"आनंद ने पेपर दिलवा दिए।"
"और तुमने दे दिए?"
"हाँ।"
"ऐसा पति नसीबों से मिलता है अनुप्रिया। कभी लड़ना नही।"
डॉक्टर की बात सुनकर अनुप्रिया सिर्फ मुस्कुरा दी।
"इस खुशी में अब अस्पताल में भर्ती हो जायो। मैं तुम्हे घर नही भेजूंगी। बस दो चार दिन की बात है। कोई जोखिम नही।" डॉक्टर ने आनंद को बुलाया औऱ स्थिति से अवगत कराया।

आनंद ने अपने और अनुप्रिया के परिवार को सूचित किया लेकिन नाराजगी के चलते अस्पताल कोई नही आया। आनंद सारा दिन अस्पताल ही रहता और अस्पताल से ही लैपटॉप पर ऑफिस का काम करता रहता। ऑफिस से आनंद को पूरा सहयोग मिला और घर से काम करने की अनुमति दे दी।
चार दिन बाद अनुप्रिया ने एक सुंदर से गोलू मोलू बच्चे को जन्म दिया। बच्चे के जन्म की खबर सुनकर भी दोनों के परिवार नाराज ही रहे। उनकी सोच जब दोनों स्वयं ही सक्षम है तब बच्चा पालने हम क्यों जाएं? अब तक खुद ही अपनी सरकार हैं तब खुद जैसा रहना चाहे तब रहें। हमे क्यों बुला रहे हैं?

आनंद और अनुप्रिया दोनों अकेले बच्चे के संग घर आ गए। दोनों का चित्त अशांत था। सोचने लगे कि क्या कसूर है उनका? सिर्फ इतना कि अपने इरादों का पाने का सपना देखा था। क्या पढ़ना गुनाह है? बच्चे ने अपनी मुस्कान से दोनों को खुद अकेले जीवन की राह पर चलने की प्रेरणा दी। आनंद ने अनुप्रिया और बच्चे के लिए सहायिका रख ली और ऑफीस जाना शुरू कर दिए।

अनुप्रिया ने अब पुस्तकों को आराम दे दिया और बच्चे की परवरिश में व्यस्त हो गई।

कुछ समय पश्चात

आज सुबह से अनुप्रिया का चित्त अशांत था। आज रिजल्ट आने को जो है। आनंद ने ऑफिस में और अनुप्रिया ने घर से रिजल्ट देखा। अनुप्रिया उत्तीर्ण हुई। दोनों की खुशी का कोई ठिकाना नही था। आनंद ऑफिस से तुरंत घर आया औऱ खुशी से अनुप्रिया को बाहों में भरते हुए कहा।
"अनु आज मुझे तुमसे से भी अधिक खुशी है।"
"मालूम है आनंद।"
"तुमने पहले मेरा सपना पूरा किया है। जो मैं नही कर सका उसे मेरे जीवन साथी ने किया।"
"इसका श्रेय सिर्फ तुम्हे जाता है। मैं तो मास्टर्स डिग्री के लिए पढ़ना चाहती थी। तुमने मेरा मार्गदर्शन किया।"
"मुझे असफलता का अनुभव था। तुमने सफलता पर निशाना साधा।"
"तुम्हे मुझ पर इतना यकीन कैसे हुआ?"
"तुम्हारी आँखों मे पढ़ाई की चाहत और निष्ठा देख कर तुम्हे प्रेरित किया।"
"तानाशाही तो तुमने की।"
"कौन सी?"
"गर्भ के नौवें महीने पेपर दिलवाए। याद है कितनी मुश्किल से अंतिम पेपर दिया था।"
"यह तानाशाही नही प्रेम था पगली तभी सारे पेपरों में तुम्हारे साथ रहा। अनहोनी की शंका रहती थी लेकिन तुम्हे बताया नही।"
"तुम्हारी आँखों को मै हर रोज पढ़ती थी।"
"अब ट्रेनिंग पर जाना है अनु तुमने।"
"बच्चे की परवरिश?"
"मैं हूँ न।"
"बहुत मुश्किल है बच्चे को छोड़ कर ट्रेनिंग पर जाना।"
"कोई बात नही सब ठीक होगा। तुम चिंता न करो। मेरिट लिस्ट में तुम्हारा स्थान बारवां है। तुम बेफिक्र ट्रेनिंग पर जाओ।"

भारी मन से अनुप्रिया दूध पीते बच्चे को छोड़ ट्रेनिंग पर गई। आनंद पिता और माता दोनों की भूमिका निभाने लगा। ऑफिस में उसकी व्यथा देख उसके साथियों ने सोशल मीडिया पर शेयर कर दिया। बात आनंद और अनुप्रिया दोनों के परिवार तक पहुंची। दोनों परिवारों का अहम अनुप्रिया की सफलता पर टूटा। अनुप्रिया की माँ बच्चे की देखभाल के लिए आनंद संग रहने लगी। दोनों परिवारों को आनंद और अनुप्रिया का पढ़ाई की धुन में उनसे कुछ समय के लिए कटने का महत्व समझ आने लगा।

अनुप्रिया की ट्रेनिंग के दौरान अनुप्रिया ने माता-पिता ने ट्रेनिंग सेंटर के समीप कमरा किराये पर लेकर रहने लगे ताकि अनुप्रिया बच्चे से दूर न रहे।
आनंद और अनुप्रिया की तपस्या रंग लाई। ट्रेनिंग के पश्चात अनुप्रिया को आईएएस अधिकारी बनने पर देहरादून में पहली पोस्टिंग मिली।
आज दोनों परिवारों ने अनुप्रिया की सफलता पर जश्न मनाने के लिए पार्टी का आयोजन किया। आनंद और अनुप्रिया ने मुस्कुराते हुए एक दूसरे की आँखों मे देखा।
"अनु तुम्हारा सपना पूरा हुआ।"
"आनंद रास्ता तुमने दिखाया था।"
"चली तुम थी।"
"हाथ हमेशा तुमने पकड़ कर रखा था।"
"अब तो तुम्हारा ओहदा मेरे से ऊपर हो गया है श्रीमती जी।"
"श्रीमान जी पत्नी का ओहदा हमेशा पति से ऊपर ही रहता है। आदाब तो करना ही होगा।"
"आदाब श्रीमती जी।"
"ऐसे नही सिर्फ प्रेम का आदाब।"
दोनों प्रेम में मग्न हो गए।

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किस्मत

सुबह से रुक-रुक होती बरसात ने दोपहर के समय उग्र रूप धारण कर लिया। लक्ष्मीनारायण की फ्लाइट कैंसल हो गई और एक दिन अधिक भोपाल में मजबूरन रहना ...